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किशोरावस्था- किशोरावस्था की विशेषताएँ | Adolescence - Characteristics of adolescence

बाल्यावस्था के समापन के साथ अर्थात 13 वें वर्ष से किशोरावस्था की शुरुआत होती है। इस अवस्था में बालक, बालिकाओं में क्रांतिकारी मानसिक (Mental), शारीरिक (Physical), सामाजिक (Social) एवं संवेगात्मक (emotional) परिवर्तन होते हैं। इसलिए किशोरावस्था (adolescence) को जीवन के तूफान का काल (storm of life) भी कहा जाता है। यह अवस्था बाल्यावस्था तथा प्रौढ़ावस्था के मध्य का संधिकाल (juncture) कहलाता है। इस अवस्था को संवेग प्रधान काल (Emotional prime time) भी कहा जाता है। इस अवस्था में किशोर एवं किशोरियों में काम भावना के लक्षण स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। किशोर एवं किशोरियाँ अपने को अच्छा दिखाने के लिए सजते-समझते हैं ताकि विपरीत लिंगी आकर्षण (opposite sex attraction) उनके प्रति बड़े। इस अवस्था को तनाव एवं ख्वाब की अवस्था (state of tension and dream) भी कहा जाता है क्योंकि इसमें विरोधी प्रवृत्तियों का विकास होता है। किशोरावस्था का काल कल्पनात्मक तथा भावनाप्रधान (imaginative and emotional) होता है। इस अवस्था में जीवन साथी की तलाश (looking for life partner) होती है। किशोर तथा किशोरियाँ अपने भावी जीवन के लिए जीवन साथी के लिए तरह-तरह की कल्पनाएँ करते लगते हैं। इसी के साथ-साथ उनकी व्यावसायिक चिंताएँ (business concerns) भी बढ़ने लगती हैं। इस अवस्था में किशोर के अंदर अधिकारियों, अभिभावकों तथा अपने शिक्षकों के प्रति विरोध की प्रवृत्ति (tendency to oppose) भी पाई जाती है। यद्यपि पूर्व किशोरावस्था में काल्पनिक जीवन अधिक होता है लेकिन उत्तर किशोरावस्था में व्यवहार में स्थायित्व आने लगता है। अनुशासन तथा सामाजिक नियंत्रण का भाव विकसित हो जाता है। कुल मिलाकर इस अवस्था में बड़ा ऋणात्मक पहलू किशोरों में समायोजन क्षमता (adjustability) की कमी का होता है। इस अवस्था में इच्छाओं की पूर्ति न होने पर पलायनवादी प्रवृत्ति होती है, जिनमें भावनाओं में बहकर आत्महत्या का भाग भी इस अवस्था में अधिक दिखाई देता है। वीर पूजा (Veer Pooja) की भावना के कारण कभी-कभी किशोर अपराधियों के पिछलग्गू बन जाते हैं। जिससे अपराध की दुनिया में जाने का भय भी बना रहता है। वैसे तो किशोरावस्था जीवन का बसंत काल (spring of life) कहा जाता है। किंतु इस अवस्था में किशोरों का रुझान जिस ओर हो जाये वे आगे चलकर उसी क्षेत्र में कुछ बन जाने में सफल हो जाते हैं। जैसे कि जिन किशोरों की रुचि संगीत (interest music) में होती है वे संगीतकार बन जाते हैं और जिनकी विज्ञान में होती है वह वैज्ञानिक बन जाते हैं। इसके अलावा संगति के प्रभाव से या अन्य कारणों से किशोरों में कुछ बुरी आदतें जैसे बीड़ी सिगरेट पीना, मदीरा पीना, कक्षा से भागना, हद से ज्यादा सिनेमा देखना इत्यादि। इस तरह से यह क्रांतिकारी एवं झंझावात (revolutionary and storm) की अवस्था है यदि इसे सही दिशा मिल जाये और मूल प्रवृत्तियों का शोधन हो सके तो किशोर का श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्मित हो सकता है।

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किशोरावस्था की विशेषताएँ (characteristics of adolescence)–

(1) विकासात्मक विशेषता (Developmental Trait)– किशोरावस्था को शारीरिक विकास का सर्वश्रेष्ठ काल माना जाता है। इस नाम में किशोर के शरीर के अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं, जैसे भार और लंबाई में तीव्र वृद्धि, मांस पेशियों और शारीरिक ढांचे में दृढ़ता, किशोर में दाढ़ी और मूँछ (Beard and Mustache) की रोमावलियों का आना एवं किशोरियों में प्रथम मासिक स्राव (Menstruation) के दर्शन आदि।

(2) कल्पना की बहुलता (Plurality of Imagination)- किशोर के मस्तिष्क का लगभग सभी दिशाओं में विकास होता है। उसमें विशेष रुप से लिखित मानसिक गुण (mental quality) पाए जाते हैं। कल्पना व दिवास्वप्नों की बहुलता (Multiplicity of fantasy and daydreams) बुद्धि का अधिकतम विकास सोचने समझने और तर्क करने की शक्ति में वृद्धि विरोधी मानसिकता दशाएँ आदि। किशोर किसी समूह का सदस्य होते हुए भी केवल एक या दो बालकों से घनिष्ठ संबंध रखता है, जो उसके परम मित्र होते हैं।

(3) संवेंगो में अस्थिरता (Volatility in Sentiment)- किशोरों में आवेगों एवं संवेगों की बहुत प्रबलता होती है। इसी कारण वह विभिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न व्यवहार करता है। उदाहरण के तौर पर किसी समय वह बहुत क्रियाशील रहता है तो किसी समय अधिकांशतः कायर या उदासीन। उसमें उत्साह व उत्साहहीनता के लक्षण समयानुसार देखे जा सकते हैं। डॉ. माथुर का कथन है- “किशोरावस्था में बालक अत्यंत संवेगात्मक अवस्था में रहता है उसमें भावुकता, अस्थिरता, घबराहट के भाव उतार चढ़ाव एवं चरम सीमा पर होते हैं। वह कभी कभी बहुत उत्तेजित हो जाता है और कभी अत्यंत मलीन मन और खिन्न दिखाई देता है। उसके संवेग आनंद एवं उदासीनता के बीच आते रहते हैं।”

(4) शैशवावस्था का पुनरावर्तन काल (Relapse of Infancy)- मनोवैज्ञानिक रॉस (Ross) ने किशोरावस्था को शैशवावस्था का पुनरावर्तन काल कहा है, क्योंकि किशोर बहुत कुछ शिशु के समान होता है। उसकी बाल्यावस्था की स्थिरता समाप्त हो जाती हैं और वह एक बार फिर शिशु के समान अस्थिर हो जाता है। उसके व्यवहार में इतनी उद्विग्नता आ जाती है कि वह शिशु के समान अन्य व्यक्तियों और अपने वातावरण से समायोजन नहीं कर पाता है। अतः रॉस का विचार है कि- " शिशु के समान किशोर को अपने वातावरण से समायोजन करने का कार्य फिर से आरंभ करना पड़ता है।"

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(5) स्वतंत्रता की भावना (Sense of Freedom)– किशोर में शारीरिक एवं मानसिक स्वतंत्रता की प्रबल भावना होती है। वह बड़ों के आदेशों, अन्धविश्वासों के बंधनों में व बँधकर स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहता है। यदि उस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध लगाया जाता है, तो उसमें विद्रोह की भावना विकसित होती है।

(6) काम भावना में परिपक्वता (Maturity in Sex)- कामेन्द्रियों की परिपक्वता और कामशक्ति का विकास किशोरावस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। इस अवस्था के पूर्व में अर्थात पूर्व किशोरावस्था में विषमलिंगी आकर्षण होता है व वे एक दूसरे को आकर्षिक करने हेतु सकते सकते हैं।

(7) समूह के प्रति समर्पण (Devotion to the Own Group) – किशोर जिस समूह का सदस्य होता है, उसको वह अपने परिवार और विद्यालय से अधिक महत्वपूर्ण समझता है। यदि उसके माता-पिता और समूह दृष्टिकोणों में अंतर होता है, तो वह समूह के ही दृष्टिकोणों को बेहतर मानता है और उन्ही के अनुसार अपने व्यवहार, रुचियों, इच्छाओं आदि में परिवर्तन करता है।

(8) रुचियों में परिवर्तन (Change in Interests)– एवं स्थायित्व पन्द्रह वर्ष की आयु तक किशोरों की रुचियों में परिवर्तन होते रहता है किंतु उसके बाद के वर्षों में किशोरों की रुचियों में स्थायित्व आ जाता है अर्थात उनकी रुचियाँ आगामी जीवन तक बनी रहती हैं। बालकों को खेलकूद और व्यायाम में विशेष रूचि होती है जबकि बालिकाओं कढाई-बुनाई, नृत्य, संगीत, सिलाई आदि प्रति विशेष आकर्षण होता है।

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(9) समाज सेवा की भावना (Spirit of Social Service) - किशोरों में समाज सेवा की अति तीव्र भावना होती है। इस सम्बंध में रॉस महोदय ने लिखा है- “किशोर समाज सेवा के आदर्शों का निर्माण और पोषण करता है। उसका उदार हृदय मानव जाति के प्रेंम से ओत-प्रोत होता है और वह आदर्श समाज का निर्माण करने में सहायता देने कि के लिए उद्विग्न रहता है।"

(10) धार्मिक एवंं नैतिक भावनाओं का उदय (Rise of Religious and Moral Sentiments)– किशोरावस्था के आरंभ में बालकों को धर्म व ईश्वर में आस्था नहीं होती। इनके सम्बंध में उनमें इतनी शंकाएँ उत्पन्न होती हैं कि वे इनका समाधान नहीं कर पाते। किंतु-धीरे-धीरे उनमें धर्म में विश्वास उत्पन्न हो जाता है और वे ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने लगते हैं।

(11) जीवन दर्शन का निर्माण (Building Philosophy of Life) - किशोरावस्था पूर्व बालक अच्छी और बुरी, सत्य और असत्य, नैतिक और अनैतिक अनेक तरह की बातों के बारे में कई तरह के प्रश्न रहता है। जब वह किशोरावस्था में आता है तब वह स्वयं इन बातों पर विचार करने लगता है, परिणामस्वरूप अपने जीवन दर्शन का निर्माण करता है। ऐसे सिद्धांतों का निर्माण करना चाहता है जिनकी सहायता से वह में अपने जीवन में कुछ बातों निर्माण कर सके। उसे इस कार्य में सहायता देने के उद्देश्य से ही आधुनिक युग में युवा आंदोलनों को संगठित किया गया। किशोरावस्था में बालक में अपने जीवन दर्शन अनुभवों की इच्छा, निराशा असफलता, प्रेंम के अभाव आदि के कारण अपराध प्रवृत्ति का विकास होता है।

(12) श्रेष्ठता की चाहत (Desire for Excellence)– किशोर में महत्वपूर्ण व्यक्ति बनने और प्रौढ़ों के समान निश्चित स्थिति प्राप्त करने की अत्यधिक अभिलाषा होती है। ब्लेयर, जोन्स एवं सिम्पसन (Blair, Jones and Simpson) इस सम्बंध में कहा है – "किशोर का महत्वपूर्ण बनना, अपने समूह में स्थिति प्राप्त करना और श्रेष्ठ व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाना चाहता है।"

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(13) अपने व्यवसाय के प्रति चिन्ता (Concern about Own Business)– किशोरावस्था में बालक अपने भावी व्यवसाय को चुनने के लिए चिंतित रहता है। इस संबंध में स्ट्रेंग का मत है - "जब छात्र हाईस्कूल में होता है, तब वह किसी व्यवसाय को चुनने, उसके लिए तैयारी करने, उसमें प्रवेश करने और उन्नति के लिए अधिक चिंतित रहता है।"

(14) अपराधी प्रवृत्ति (Criminal Tendency)- किशोरावस्था में उद्विग्नता अधिक होने के कारण कभी-कभी किशोर उचित निर्देशन या व्यवस्थाओं के अभाव में कई तरह के अपराध कर बैठते हैं, जिसका उसे परिपक्वता की आयु में काफी पछतावा भी होता है। अपराध का एक कारण बालक के अन्दर कल्पना की बहुलता भी है। विद्वान बर्टले ने कल्पनाशक्ति से होने वाली हानि की ओर इंगित करते हुए लिखा है - "प्रायः सभी बाल अपराधी किशोर दिवास्वप्नदृष्टा होते हैं।”

(15) आत्म सम्मान उदय (Self Esteem Rise)– किशोरावस्था वह अवस्था है जब किशोर के अन्दर आत्म सम्मान के भाव पैदा हो जाते हैं। वह अपने सम्मान की रक्षा हेतु हर सम्भव कदम उठाने का तत्पर रहता है। यदि कोई उसके सम्मान को ठेस पहुँचाता है तो वह उसका शत्रु बन जाता है और उससे बदला लेने की सोचने लगता है।

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(16) तार्किकता का विकास (Development of Reasoning)- किशोरावस्था में किशोर, किशोरियों के अन्दर इतना मानसिक विकास हो जाता है कि वह हर क्षेत्र की बातों में तर्क-वितर्क या विश्लेषण प्रस्तुत करने में समर्थ हो जाता है। वह घर-परिवार या अपने समूह में किये जाने वाले कार्यों के सम्बंध में उचित सलाह देने लगता है।

(17) वीर पुरुष पूजा (Veer Purush Pooja)- यह अवस्था जीवन वे क्षण होते हैं, जब प्रत्येक किशोर किसी न किसी व्यक्ति को अपना आदर्श मानते लगता है और उसी के नक्शे-कदम पर चलने की चाह रखते हैं। उनके आदर्श निश्चित ही समाज में चर्चित व्यक्ति होता है।

(18) पदार्थ भावना का विकास (Development of Sensitiveness) - किशोरों में प्रायः पदार्थ भावना देखी जा सकती है। जब बालक में ऐसी भावना सक्रिय हो जाती है तब के अपने देश, मानव जाति, अपने आदर्श नेता के लिए सब-कुछ करने को प्रस्तुत हो जाते हैं। वे जोश में आकर हर तरह से त्याग करने को तत्पर रहते हैं।

शिक्षक चयन परीक्षाओं के प्रश्न पत्रों को यहाँ👇 से डाउनलोड करें।
1. संविदा शाला वर्ग 3 का 2005 प्रश्न पत्र डाउनलोड करें
2. संविदा शाला वर्ग 2 का 2005 का प्रश्न पत्र डाउनलोड करें

आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों / विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
RF Temre
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