बाल विकास की अवधारणा एवं परिभाषाएं : MP TET or CTET and Teachers TET exam preparation
बाल विकास का अर्थ, परिभाषाएं और विद्वानों के मत : Teachers TET Exam 2026
बाल विकास की अवधारणा:-
सामान्य अर्थों में बाल विकास से आशय एक बालक के संपूर्ण विकास अर्थात शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक आदि विकासों से होता है। विकास का अर्थ परिवर्तन होना है और परिवर्तन होने की प्रक्रिया सतत रूप से जीवन पर्यंत तक चलती रहती है। परिवर्तन दो तरह से होते हैं- मात्रात्मक परिवर्तन एवं गुणात्मक परिवर्तन। बाल विकास की प्रक्रिया में बालक का व्यवहार, उसका व्यक्तित्व, उसका स्वभाव एवं दृष्टिकोण, उसके जीवन के मूल्य, उसकी रुचियां एवं आदतें आदि बातें अध्ययन का विषय होती हैं। विकास क्रमिक एवं सतत रूप से चलने वाली वह प्रक्रिया है, जिसमें शारीरिक एवं मानसिक विकास के अलावा संज्ञानात्मक, क्रियात्मक, भाषाई आदि विकास सम्मिलित होते हैं। विकास एक बहुमुखी क्रिया है, जिसके अनेक क्षेत्र हैं एवं यह परिवर्तनों की एक श्रृंखला है। विकास की प्रक्रिया में एक बालक गर्भावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक के विभिन्न पदों से गुजरते हुए पूर्णता अर्थात परिपक्वता की स्थिति को प्राप्त करता है।
विकास की परिभाषाएं :- (विद्वानों के अनुसार)
(1) जेम्स ड्रेवर के अनुसार :- "विकास प्राणी में प्रगतिशील परिवर्तन है, जो किसी निश्चित लक्ष्य की ओर निरंतर निर्देशित रहता है।"
(2) गैसल के अनुसार :- "विकास केवल एक प्रत्यक्ष या धारणा ही नहीं है अपितु विकास का निरीक्षण किया जा सकता है, मूल्यांकन किया जा सकता है तथा मापन किया जा सकता है। विकास का मापन शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारिक तीनों दृष्टि से किया जा सकता है।"
(3) गैसल के अनुसार :- "विकास एक प्रकार का परिवर्तन है जिसके द्वारा बच्चों में नई विशेषताओं तथा क्षमताओं का प्रादुर्भाव होता रहता है।"
(4) जीन पियाजे के अनुसार :- "विकास का क्रम प्राथमिक होकर सार्वभौम है। अलग-अलग प्राणियों में यह अलग अलग ही पाया जाता है। व्यक्ति परिवेश में विकसित आवश्यकताओं को पूर्ण करने की प्रक्रिया द्वारा ही विकास पद पर बढ़ता है।"
(5) हैरिस के अनुसार :- "विकास जीवित प्राणी को संगम की जटिलता की दिशा में एक समयानुसार गतिक्रम है।"
(6) ई.बी. हरलाक के अनुसार :- "विकास प्रगतिशील परिवर्तनों का एक नियमित, क्रमिक तथा संबद्ध क्रम है, जो कि परिपक्वता की प्राप्ति की ओर निर्देशित रहता है। यह आकस्मिक नहीं होता, परंतु इसमें प्रत्येक अवस्था आगामी विकासात्मक क्रम के बीच निश्चित सुसम्बद्ध रहती है।"
संक्षेप में कहें तो - "विकास बड़े होने तक सीमित नहीं है, वस्तुतः यह व्यवस्थित तथा समानुपात प्रगतिशील क्रम है जो परिपक्वता की प्राप्ति में सहायक होता है।"
(7) ईरा जी. जार्डन के अनुसार :- "विकास ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जन्म से लेकर उस समय तक निरंतर चलती रहती है जब तक की वह पूर्ण विकास को प्राप्त नहीं कर लेता।"
(8) जेम्स ड्रेवर के अनुसार :- (अन्य शब्दों में)- "विकास वह दशा है जो प्रगतिशील परिवर्तन के रूप में प्राणी में सतत रूप से व्यक्त होती है यह प्रगतिशील परिवर्तन किसी भी प्राणी में भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ अवस्था तक होता है। यह विकास तंत्र को समान रूप से नियंत्रित करता है। यह प्रगति का मापदंड है और इसका आरंभ शून्य से होता है।"
(9) पीकूनस और असब्रेच अनुसार :- "विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा बच्चे या व्यक्ति की क्षमताओं का प्रस्फुटन होता है और उसमें नई योग्यताओं में नए कौशल, गुणों और विशेषताओं का समावेश होता है, साथ ही उसमें प्राणी की वृद्धि, ऊंचे दर्जे की विभिन्नता, जटिलता, कुशलता, उसकी शिराओं तथा संरचनात्मक समस्याओं का अपचय, परिपक्वीकरण तथा उसके कार्यात्मक एवं अनुकूलात्मक योग्यता के अपक्षय अंतर्निहित रहता है।"
(10) एम. ई. ब्रेकनीज व ई. ली. बिनसेन्ट के अनुसार :- "विकास व्यक्ति की क्षमताओं का क्रमिक आविर्भाव तथा प्रसार है जो कि उसे अनुक्रमात्मक रूप से कार्य करने की क्षमता प्रदान करता है। यह विकास व्यक्ति और उसके वातावरण के मध्य गत्यात्मक संबंध द्वारा संभव होता है और इस प्रकार के बालक और वातावरण के बीच निरंतर अन्योन्य क्रिया अनेक और जटिल परिवर्तनों को जन्म देती है और इसे ही विकास कहा जाता है।"
(11) गैसल के अनुसार :- (अन्य शब्दों में)- "विकास प्रत्यय से अधिक है। इसे देखा, जाँचा और किसी भी सीमा तक तीन प्रमुख दिशाओं, शरीर अंक विश्लेषण, शरीर ज्ञान तथा व्यवहारात्मक में मापा जा सकता है .........................इस सब में, व्यवहारिक संकेत ही सबसे अधिक विकासात्मक स्तर और विकास शक्तियों को व्यक्त करने का माध्यम है।"
(12) ई. बी. हरलाक के अनुसार :- (अन्य शब्दों में) "विकास की प्रक्रिया बालक के गर्भावस्था से लेकर जीवन पर्यंत एक क्रम में चलती रहती है तथा प्रत्येक अवस्था का प्रभाव दूसरी अवस्था पर पड़ता है।"
(13) मुनरो के अनुसार :- "परिवर्तन श्रंखला की वह अवस्था, जिसमें बच्चा भ्रूण अवस्था से लेकर प्रौढ़ावस्था तक गुजरता है, विकास कहलाता है।"
(14) ई.एल टेलर के अनुसार :- "मनुष्य जो कुछ रहता है या जो कुछ दिखता है, वह हर पल, प्रतिक्षण परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर कर परिवर्तन की ओर उन्मुख होता है। यही उसकी आगे चलकर जीवनशैली कहलाती है।"
(15) जीन पियाजे का विकास के संदर्भ में मत - विकास की प्रक्रिया में 4 मौलिक तत्व भाग लेते हैं और विकास इन चारों तत्वों के बीच संश्लेषण का परिणाम है। ये तत्व हैं (अ) परिपक्वता (ब) सामाजिकता (स) अनुभव (द) संतुलनीकरण
उपरोक्त परिभाषाओं के विश्लेषण के पश्चात हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि विकास किसी भी प्राणी में होने वाला एक प्रगतिशील परिवर्तन है जो कि एक प्राणी के गर्भ में आने से लेकर उसके जन्म, शैशवावस्था बाल्यावस्था, किशोरावस्था, वृद्धावस्था एवं अंत में मृत्यु तक चलता रहता है। विकास का दौर प्रतिपल होते रहता है अर्थात मानव या किसी भी प्राणी में हर पल परिवर्तन होते रहता है। प्राणी में वातावरण के प्रभावों के कारण जो परिवर्तन होते हैं, वही विकास है। विकास केवल शारीरिक वृद्धि की ओर संकेत नहीं करता बल्कि इसके अंतर्गत व्यक्ति में वे सभी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक भाषाई, संज्ञानात्मक, नैतिक, गामक विकास आदि परिवर्तन सम्मिलित रहते हैं। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताओं का उदय होता है। हालांकि विकास की प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तन वंशानुक्रम से प्राप्त गुणों तथा वातावरण दोनों का ही परिणाम होता है। विकास की प्रक्रिया में होने वाले शारीरिक परिवर्तनों को आसानी से देखा जा सकता है किंतु अन्य दिशाओं में होने वाले परिवर्तनों को समझने में समय लग सकता है।
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