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विषयवस्तु विवरण

विकास के स्वरूप (बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र)<br> Nature of development- Child Development and Pedagogy


विकास के स्वरूप (बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र)
Nature of development- Child Development and Pedagogy

(1) आकार में परिवर्तन (Change in the Size):–

(1) आकार में परिवर्तन (Change in the Size):–

बालक के शारीरिक विकास क्रम में आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर के आकार एवं वजन में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं।

(As the age progresses in the physical development of the child, there are constant changes in body size and weight.)

(2)आनुपातिक परिवर्तन (Proportional Change) :–

बालक के स्वरूप में परिवर्तन अनुपातिक होता है। मानव के शरीर में सभी अंग आनुपातिक रूप से परिपक्व होते हैं, अर्थात एक साथ अंगों में परिपक्वता नहीं आती हैं। इस तरह से बालक के विभिन्न विकास के दौरों में अनुपातिक परिवर्तन देखा जाता है।

(Changes in the appearance of the child are proportional. All organs in a human body mature proportionally, that is, organs do not come to maturity simultaneously. In this way, proportional changes are seen in the different developmental stages of the child.)

(3) पुराने स्वरूप में परिवर्तन (Changes in the Old Form) :–

जब बालक में नई विशेषताएं जागृत होती हैं, तो पुरानी विशेषताएँ गायब हो जाती हैं। जैसे बालक के दूध के दाँत, अस्पष्ट ध्वनियाँ, रेंगना, तुललाना, रोना आदि गुण समाप्त होने लगते हैं।

(When new features are awakened in the child, the old features disappear. As the baby's milk teeth, indistinct sounds, creep, cry etc. qualities begin to disappear.)

(4) नवीन गुणों की प्राप्ति (Acquisition of New Qualities)–

जब बालक विकास के क्रम में आगे बढ़ता है तब उसमें नवीन गुण जागृत होते हैं, जिनके दम पर वह अपने जीवन पथ में विभिन्न उपलब्धियों को प्राप्त करता है।

(When the child progresses in the order of development, then new qualities are awakened in him, on which he achieves various achievements in his life path.)

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