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शैशवावस्था इसका स्वरूप, महत्व एवं विशेषताएँ | बाल विकास एवं शिक्षा शास्त्र

बालक के जन्म के पश्चात 5 वर्ष की अवस्था शैशवकाल होती है। बालक की इस अवस्था को “बालक का निर्माण काल” माना जाता है। इसी अवस्था में बालक में भावी जीवन का निर्माण किया जा सकता है।
फ्रायड ने इस सम्बंध में कहा है- “मानव को कुछ भी बनाना होता है, वह प्रारंभिक 5 वर्षों में ही बन जाता है।” इस अवस्था में बालक अपरिपक्व होता है और अपने परिवार के सदस्यों पर निर्भर रहता है उसका व्यवहार पूर्णतः प्रवृत्तियों पर आधारित होता है, जिसकी कि वह तुरंत संतुष्टि चाहता है। सुख की चाहत एकमात्र उसका प्रेरक है। यह एक ऐसी अवस्था है, जिसमें बालक का जितना अधिक निरीक्षण और निर्देशन किया जाता है, उतना ही अधिक उत्तम उसका विकास होता है और भावी जीवन सुदृढ़ बनता है। जन्म उपरान्त नवजात शिशु के भार, अंगों और गतिविधियों में 5 वर्ष तक की अवस्था में परिवर्तन दिखाई देते हैं। विकास के साथ-साथ इसमें स्थायित्व आने लगता है।
इस अवस्था को ‘समायोजन की अवस्था' भी कहा जाता है। शिशु की उचित देखभाल द्वारा नये वातावरण के साथ उसका समायोजन माता-पिता द्वारा किया जाता है। संवेगात्मक विकास की दृष्टि से इस अवस्था में बच्चे के भीतर लगभग प्रमुख संवेग जैसे- प्रसन्नता, क्रोध, हर्ष, प्रेंम, घृणा आदि विकसित हो जाते हैं। यह अवस्था 'संवेग प्रधान अवस्था' होती है।

शैशवावस्था की मुख्य विशेषताएँ-

(1) शारीरिक विकास में तीव्रता- शैशवावस्था के प्रथम 3 वर्ष शिशु के शारीरिक विकास की तीव्रता को प्रदर्शित करते हैं। 3 वर्ष के पश्चात शारीरिक परिवर्तन की गति कुछ मंद पड़ जाती है। इस अवस्था में शिशु की इंद्रियों, कर्मेन्द्रियों, आंतरिक अंगों, मांस पेशियों आदि का क्रमिक विकास होता है।

(2) मानसिक विकास में तीव्रता- शिशु की मानसिक क्रियाओं जैसे- ध्यान, स्मृति, कल्पना शक्ति, संवेदना और प्रत्यक्षीकरण आदि का विकास तीव्र गति से होता है। 3 वर्ष की अवस्था में शिशु की मानसिक शक्तियाँ कार्य करना प्रारंभ कर देती हैं।

(3) सीखने की प्रक्रिया में तीव्रता- शिशु के सीखने की प्रक्रिया में बहुत तीव्रता होती है और वह अनेक आवश्यक बातों को सीख लेता है।

(4) कल्पना की सजीवता- कल्पना की सजीवता का अर्थ कल्पनाशील बातों को वास्तविक मानना है। 4 वर्ष का बालक में कल्पना की सजीवता पाई जाती है। वह सत्य व असत्य में अंतर नहीं कर पाता है। फलस्वरूप असत्यभाषी जान पड़ता है। वह अपने शोध, प्रबंधन और अनेक कल्पनाएँ करने लगता है।

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(5) दूसरों पर निर्भरता- जन्म के तुरंत बाद शिशु कुछ समय तक बहुत ही असहाय स्थिति में रहता है। उसे भोजन और अन्य शारीरिक आवश्यकताओं के अलावा प्रेंम और सहानुभूति पाने के लिए भी दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है।

(6) आत्म प्रेंम की भावना- शिशु अपने माता-पिता, भाई-बहन, दादा-दादी आदि का प्रेंम प्राप्त करना चाहता है। किंतु साथ ही वह यह भी चाहता है कि प्रेंम उसके अलावा और किसी को न मिले। यदि किसी और के प्रति प्रेंम व्यक्त किया जाता है तो शिशु को उससे ईर्ष्या होने लगती है। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि वह स्वयं सुरक्षित रहना चाहता है। उदाहरण के लिए उसके बराबर के अन्य शिशु उसके साथ रहते हैं तो वह उन्हें कब धकेल दे या चोट पहुँचा दे इसका भरोसा नहीं किया जा सकता। इससे यह साबित होता है कि उसके भीतर आत्ममोह की भावना कूट-कूट कर भरी होती है।

(7) नैतिकता का अभाव- शिशु को अच्छी-बुरी, उचित-अनुचित बातों का ज्ञान नहीं होता है। वह उन्हीं कार्यों को करना चाहता है जिसमें उसे आनंद आता है।

(8) मूल प्रवृत्तियों पर आधारित व्यवहार- शिशु के अधिकांश व्यवहारों का आधार उसकी मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं। जैसे कि यदि उसको भूख लगती है तो वह किसी भी वस्तु को अपने मुँह में डालने लगता है। यदि वह वस्तु उसके उससे छुड़ा ली जाती है तो वह रोने लगता है।

(9) सामाजिकता की ओर अग्रसर- शिशु इस अवस्था के अंतिम चरण 4 से 5 वर्ष की उम्र में उसमें सामाजिक भावना का विकास होने लगता है। जैसे कि अपने हम उम्र के बालकों के साथ खेल खेलना, अपने भाई-बहनों के प्रति रक्षात्मक व्यवहार आदि इसी बात की ओर इंगित करते हैं।

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(10) रुचि या अरुचि प्रदर्शन- शिशु में दूसरे बालकों के प्रति रुचि या अरुचि उत्पन्न हो जाती है। बालक 1 वर्ष का होने के पूर्व ही अपने साथियों में रुचि व्यक्त करने लगता है। आरंभ में इस रुचि का स्वरूप अनिश्चित होता है परंतु शीघ्र ही यह अधिक निश्चित रूप धारण कर लेती है और रुचि एवं अरुचि के रूप में प्रकट होने लगती है।

(11) संवेगों का प्रदर्शन- बालक में 2 वर्ष की अवस्था में संवेगों का विकास हो जाता है। बाल मनोवैज्ञानिकों ने शिशु के मुख्य चार संवेग बताये हैं। (1) भय (2) क्रोध (3) प्रेंम (4) पीड़ा।

(12) काम भावना- बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि शिशु में काम प्रवृत्ति बहुत प्रबल होती है, किंतु वह वयस्कों की भॉति अपनी काम भावना को प्रकट नहीं कर पाता। शिशु का माता का स्तन पान करना, यौनांगों का स्पर्श आदि उसकी काम प्रवृति की ओर इंगित करते हैं।
किंतु बहुत से विद्वान इस बात से सहमत नहीं हैं उनका कहना है कि शिशु के अंदर कुछ सहज प्रवृत्तियाँ होती हैं जिन्हें काम का सूचक नहीं माना जाता। अतः शिशु के अंदर कामेच्छा की भावना को नकारा भी जा सकता है।

(13) दोहराव प्रवृत्ति- बालक अर्थात् शिशु में शब्दों एवं विभिन्न गतिविधियों को बार-बार पुनरावृति करने की प्रवृत्ति पाई जाती है। वह जो शब्द सुनता है या गतिविधि को देखता है तो वह उसे बार-बार दोहराता है।

(14) जिज्ञासा की प्रधानता- शिशु में जिज्ञासा की प्रवृत्ति का बाहुल्य होता है। आपने देखा होगा कि शिशु अपने खिलौनों को उलट-पुलट कर देखता व उससे खेलता रहता है। कभी-कभी तो खिलौनों या अन्य वस्तुओं को तोड़-फोड़ कर उसके अंदर देखता है कि उसमें क्या है? कभी-कभी अपने से बड़ों से कई तरह के प्रश्न पूछता है। इन बातों से स्पष्ट है कि उसके अंदर जिज्ञासा की प्रवृत्ति कूट-कूट कर भरी होती है।

(15) अनुकरण कर सीखने की प्रवृत्ति- शिशु के अंदर अनुकरण कर सीखने की प्रबल प्रवृत्ति पाई जाती है। अपने माता-पिता या भाई बहन को उनके कार्यों को देखकर वह भी उसी तरह के कार्य करने लगता है। जैसे शिशु के बड़े भाई या बहन पुस्तक पढ़ते हैं तो वह भी पुस्तक पढ़ने या लिखने की नकल करता है।

(16) खेल प्रवृत्ति- शिशु में स्वभावतः खेल प्रवृत्ति पाई जाती है। वह अकेले या हम उम्र शिशुओं के साथ विभिन्न प्रकार के खेल दिन भर खेलते रहता है। वह चुपचाप बैठा नहीं रह सकता। खेल में उसे महान आनंद की अनुभूति होती है।

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शैशवावस्था का स्वरूप-

बाल विकास के अध्ययन में यह बात महत्वपूर्ण है कि शैशवावस्था का स्वरूप कैसा होना चाहिए? यदि शैशवावस्था में बालक का परिवेश व आसपास का वातावरण उसके अनुकूल होता है तो विकास की दौड़ में वह शिशु निश्चित ही आगे होता है। अतः शैशवावस्था का स्वरूप कैसा हो इसका विवरण बिन्दुवार इस प्रकार है।

(1) घर का वातावरण शान्त, सुरक्षित और स्वस्थ होना चाहिए।
(2) शिशु के प्रति सदैव प्रेंम, शिष्टता व सहानुभूति रखना चाहिए।
(3) बच्चे द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों का उसकी समझ के अनुसार समुचित उत्तर देना चाहिए। अर्थात उसकी जिज्ञासा शांत की जानी चाहिए।
(4) शिशु कल्पना जगत में विचरण करता है। अतः उसे ऐसे विषयों की शिक्षा देनी चाहिए जो उसे वास्तविकता के निकट लाये।
(5) शिशु को आत्मनिर्भर बनने, स्वयं सीखने व कार्य करने के अवसर दिए जाने चाहिए। उसे पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान करना चाहिए किंतु उचित-अनुचित बातों के बारे में समझाना चाहिए।
(6) शिशु के अंदर अनेक कौशल एवं गुण निहित होते हैं अतः उन्हें उभारने का प्रयास किया जाना चाहिए।
(7) सामाजिक भावना की ओर अग्रसर होने के अवसर प्रदान करने हेतु उसे 4 या 5 वर्ष की उम्र के दरमयान अन्य शिशुओं या बच्चों से घुलने मिलने, परस्पर खेलने के अवसर प्रदान करना चाहिए।
(8) शिशु को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के अवसर देना चाहिए, जिससे उसमें आत्म प्रदर्शन के गुण विकसित हो सकें।
(9) शिशु में मानसिक क्रियाओं की तीव्रता होती है अतः उन्हें सोचने विचारने के अधिक से अधिक अवसर दिए जाने चाहिए।
(10) शिशु को जब बोलने एवं चलने लगे तब उसे सत्य बोलने, बड़ों का आदर करने, समय पर कार्य पूरा करने जैसी अच्छी आदतों का विकास करना चाहिए।
(11) शिशु के व्यवहार का आधार उसकी मूल प्रवृत्तियाँ होती है। अतः उनका शमन करने हेतु सम्भव विधियों से प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
(12) बालक कुछ मूलभूत प्रवृत्तियों के साथ जन्म लेता है, जो उसे कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। अतः उसे उनके अनुसार कार्य करने शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
(13) शिशु के संदर्भ में माता-पिता या शिक्षक को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि शिशु खेलों को बहुत अधिक पसंद करता है अतः उसे खेल-खेल में शिक्षा दी जानी चाहिए।
शिक्षा मनोवैज्ञानिक स्ट्रेंग ने कहा है- “शिशु अपने और अपने संसार के बारे में अधिकांश बातें खेल के द्वारा सीखता है।”
(14) शैशवावस्था के अंतिम दौर अर्थात 5 वर्ष की अवस्था में शिशु को कहानियाँ सुनना अधिक पसन्द होता है अतः उसे कहानी सुनाने के साथ उसके संदर्भित पुस्तकें जो सचित्र हो उसे देखने व कहानी को मूर्त रूप प्रदान करने हेतु देना चाहिए।
(15) शिशु की ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ जैसे हाथ, पैर, नेत्र, कान उसके प्रारंभिक शिक्षक है। इन्हीं के द्वारा वह 5 वर्ष की अवस्था में पहचान सकता है, सोच सकता है और याद रख सकता है। अतः इन अंगों के उपयोगार्थ परिस्थितियों का निर्माण करना चाहिए ताकि वह अच्छी तरह परिपक्व हो सके।

शैशवावस्था का महत्व-

शैशवावस्था में शिशु पूर्ण रूप से माता-पिता पर निर्भर रहता है उसका व्यवहार मूल प्रवृत्तियों पर आधारित होता है, जीवन के प्रथम 2 वर्षों में बालक अपने भविष्य के जीवन की आधारशिला रखता है। इस संदर्भ में गुडएनफ नामक विद्वान ने कहा है कि- “व्यक्ति का जितना भी मानसिक विकास होता है उसका आधा 3 वर्ष की आयु तक हो जाता है।” शैशवावस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति को जो कुछ भी बनना होता है अर्थात उसका भावी जीवन किस ओर जाना है उसके आरंभ के चार पाँच वर्षों में ही निर्धारित हो जाता है। इसी संदर्भ में ऐडलर नामक विद्वान ने कहा है- “बालक के जन्म के कुछ माह बाद ही यह निश्चित किया जा सकता है कि जीवन में इसका क्या स्थान है।”
व्यक्ति का जितना मानसिक विकास होता है। उसका आधा शैशवावस्था की 3 वर्ष की आयु तक हो जाता है। इस अवस्था में सीखने की सीमा और तीव्रता विकास की अन्य किसी अवस्था की तुलना में बहुत अधिक होती है। यह अवस्था वह आधार है जिस पर बालक के भावी जीवन का निर्माण किया जा सकता है। अतः इस अवस्था में शिशु को जितना उत्तम निर्देशन दिया जाएगा उसका उतना ही उत्तम विकास होगा। कई मनोवैज्ञानिकों ने विकास की अवस्थाओं के संदर्भ में अनेकों विस्तृत अध्ययन किये और निष्कर्ष निकाला कि सभी व्यवस्थाओं की अपेक्षा शौशवावस्था सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

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1. बहुभाषिकता क्या है
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3. शिक्षा मनोविज्ञान- प्रकृति और उद्देश्य
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शैशवावस्था से संबंधित महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ-

(1) शैशवावस्था में शारीरिक विकास की भाँति शिशु का गत्यात्मक विकास सिर से पैर की ओर और निकट से दूर के नियम कार्य करते हैं।
(2) शैशवावस्था में विकास का क्रम सभी बच्चों में समान पाया जाता है किंतु विकास की गति में वैयक्तिक भिन्नताएँ पाई जाती है।
(3) गैसल ने शशु के सीखने के संदर्भ में कहा है- “बालक प्रथम 6 वर्षों में बाद के 12 वर्षों से दुगुना सीख लेता है।”
(4) शिशु की खेल प्रवृत्ति के संदर्भ में क्रो एण्ड क्रो ने कहा है- “बहुत छोटा शिशु अकेला खेलता है। धीरे-धीरे वह दूसरे बालकों के समीप खेलने की अवस्था में से गुजरता है। अंत में वह अपनी आयु के बालकों के साथ खेलने में महान आनंद का अनुभव करता है।”
(5) वैलेंटाइन ने सामाजिक भावना के संदर्भ में शिशु के बारे में कहा है- “4 या 5 वर्ष के बालक में अपने छोटे भाई बहनों या साथियों की रक्षा करने की प्रवृत्ति होती है। वह 2 से 5 वर्ष तक बच्चों के साथ खेलना पसंद करता है। वह अपनी वस्तुओं में दूसरों को साझीदार बनाता है। वह दूसरे बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है और दुख में उसको सांत्वना देने का प्रयास करता है”।
(6) क्रो एण्ड क्रो ने शिशुओं की कहानी सुनने की इच्छा के बारे में कहा है- “5 वर्ष का शिशु कहानी सुनाते समय उससे संबंधित चित्रों की पुस्तकें भी देखना पसंद करता है"।

इस तरह से शैशवावस्था बाल विकास की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण अवस्था मानी गई है। इस अवस्था में माता-पिता अर्थात शिशु के संरक्षक को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
आशा है, शैशवावस्था के संदर्भ में उपरोक्त जानकारी परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण और उपयोगी लगेगी, धन्यवाद।
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