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सम्राट हर्षवर्धन का राजवंश, प्रशासन, धर्म, साहित्य, उपलब्धियाँ और जीवन संघर्ष | Dynasty, Administration, Life Struggle of Emperor Harshavardhana

  • BY:RF Temre
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छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक गुप्त साम्राज्य का पतन होने के बाद उत्तर भारत में नये राजवंशों का उदय हुआ। इन राजवंशों में थानेश्वर के पुष्यभूति वंश के शासक भारतीय इतिहास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और शक्तिशाली साबित हुए। इस राजवंश को वर्धन वंश के नाम से भी जाना जाता है। इसी राजवंश के शासक सम्राट हर्षवर्धन थे। पुष्यभूति (वर्धन) वंश की स्थापना पुष्यभूति ने की थी। इस वंश के शासक वैश्य जाति से संबंधित थे। मुख्य रूप से पुष्यभूति गुप्त शासकों के सामंत थे। आगे चलकर हूणों का आक्रमण होने के पश्चात् उन्होंने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। इतिहास में इस राजवंश के शासक हूणों के साथ हुए अपने संघर्ष के कारण के लिए प्रसिद्ध हैं। इस राजवंश में नरवर्धन, आदित्यवर्धन तथा प्रभाकरवर्धन जैसे शासक हुए। प्रभाकरवर्धन के दो पुत्र एक पुत्री थे- राज्यवर्धन व हर्षवर्धन और पुत्री राज्यश्री राजकुमारी राज्यश्री ने कन्नौज के मौखरि राजवंश के शासक गृहवर्मन के साथ विवाह किया था। आगे चलकर वर्धन वंश और गौड़ वंश के मध्य संघर्ष में गौड़ शासक शशांक द्वारा राज्यवर्धन की हत्या कर दी गई। इसके पश्चात थानेश्वर के शासक हर्षवर्धन शासक बने।

After the decline of the Gupta Empire by the middle of the 6th century AD, new dynasties emerged in North India. Among these dynasties, the rulers of the Pushyabhuti dynasty of Thaneshwar proved to be the most important and powerful in Indian history. This dynasty is also known as Vardhan dynasty. Emperor Harshavardhana was the ruler of this dynasty. The Pushyabhuti (Vardhan) dynasty was founded by Pushyabhuti. The rulers of this dynasty belonged to the Vaishya caste. Mainly the Pushyabhutis were feudatories of the Gupta rulers. Later, after the attack of the Huns, he freed himself. The rulers of this dynasty in history are famous for the reason for their conflict with the Huns. In this dynasty there were rulers like Narvardhana, Adityavardhana and Prabhakarvardhana. Prabhakarvardhana had two sons and a daughter- Rajyavardhan and Harshavardhana and daughter Rajyashree Rajkumari Rajyashri married with Grihavarman, the ruler of Maukhari dynasty of Kannauj. Later, Rajyavardhan was assassinated by the Gaur ruler Shashank in the conflict between the Vardhan dynasty and the Gaur dynasty. After this, the ruler of Thaneshwar, Harshavardhana became the ruler.

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यशस्वी सम्राट हर्षवर्धन- सम्राट हर्षवर्धन ने 606 से 647 ईसवी तक शासन किया। जब उन्होंने थानेश्वर के प्रशासन को अपने हाथ में लिया तब उनकी आयु केवल 16 वर्ष थी। उनका साम्राज्य प्रमुख रूप से सामंती संगठन पर आधारित था। इसके प्रमाण सम्राट हर्षवर्धन की प्रमुख उपाधियों परमभट्टारक, सकलोत्तरापथेश्वर, महाराजाधिराज, सार्वभौम, चक्रवर्ती, परममाहेश्वर और परमेश्वर आदि से प्राप्त होता है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने सम्राट हर्षवर्धन को 'शिलादित्य' कहकर संबोधित किया है। छठी शताब्दी के मध्य में गुप्त शासकों का पतन होने के पश्चात उत्तर भारत में राजनीतिक विकेंद्रीकरण की पद्धति आरंभ हुई। हर्ष का शासनकाल आरंभ होते ही इस व्यवस्था का अंत हो गया। यशस्वी सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी प्रतिभा और बुद्धिमत्ता के द्वारा उत्तर भारत के विशाल भू-क्षेत्र को अपने साम्राज्य में शामिल किया। भारतीय इतिहास में उनका स्थान सर्वोपरि है।

Successful Emperor Harshavardhana- Emperor Harshavardhana ruled from 606 to 647 AD. He was only 16 years old when he took over the administration of Thaneswar. His empire was mainly based on feudal organization. Evidence of this is obtained from the major titles of Emperor Harshavardhana Parambhattaraka, Sakalottarapatheshwara, Maharajadhiraja, Sarvabhaum, Chakravarti, Paramaheshwar and Parameshwar etc. The Chinese traveler Hiuen Tsang addressed Emperor Harshavardhana as 'Shiladitya'. After the decline of the Gupta rulers in the middle of the 6th century, the system of political decentralization started in North India. This system came to an end as soon as Harsha's reign began. The successful emperor Harshavardhana, through his talent and intelligence, included the vast land area of ​​North India in his empire. His place in Indian history is paramount.

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चीनी यात्री ह्वेनसांग- हर्ष के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग स्थल मार्ग के माध्यम से भारत आया। उसने चीन से 629 ईसवी से यात्रा प्रारंभ की। सारे मार्गो का भ्रमण करते हुए वह भारत में पहुँचा। भारत में लंबे समय तक ठहरने के पश्चात् 645 ईसवी में स्वदेश लौट गया। मुख्य रूप से वह नालंदा (बिहार) के बौद्ध विश्वविद्यालय में अध्ययन करने और भारतवर्ष से बौद्ध ग्रंथों का संग्रह करने आया था। उसने 'सी-यू-की' नामक ग्रंथ की रचना की थी। हेनसांग को 'यात्रियों का राजकुमार' एवं 'वर्तमान शाक्यमुनि' कहा गया था। उसके अनुसार भारतीय समाज चार वर्णों में बँटा हुआ था। इनमें ब्राह्मण सबसे ऊपर थे। उसने शूद्रों को किसान कहा था। उसके विवरण के अनुसार भारत के लोग दाँतों पर काला निशान लगाते थे एवं कान में कुंडल धारण करते थे।

Chinese traveler Hiuen Tsang- During the reign of Harsha, Chinese traveler Hiuen Tsang came to India via the land route. He started his journey from China from 629 AD. Traveling all the way, he reached India. After a long stay in India, he returned home in 645 AD. Mainly he came to study at the Buddhist University of Nalanda (Bihar) and collect Buddhist texts from India. He wrote a treatise called 'Si-u-ki'. Hansang was called 'Prince of Travellers' and 'present Shakyamuni'. According to him Indian society was divided into four varnas. Among them the Brahmins were at the top. He called the Shudras farmers. According to his description, the people of India used to put black marks on the teeth and wear a coil in the ear.

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हर्ष के जीवन के अनूठे तथ्य- सम्राट हर्षवर्धन ने गौड़ (वर्तमान बंगाल) के शासक शशांक को युद्ध में पराजित किया तथा उसके राज्य कन्नौज पर अधिकार कर लिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत के उत्तरी क्षेत्र के अन्य शासकों के राज्यों को भी अपने राज्य के अधीन कर लिया। उन्होंने उत्तर भारत के कन्नौज, पंजाब, गौड़, उड़ीसा और मिथिला पर अपना अधिकार कर लिया था। इसकी पुष्टि ह्वेनसांग के यात्रा विवरण से होती है। हर्ष ने अपने शासनकाल के दौरान कुछ मैत्री संबंध भी स्थापित किए थे। उन्होंने पश्चिम के वल्लवी के शासक 'ध्रुवसेन द्वितीय' से शत्रुता समाप्त की और उससे अपनी पुत्री का विवाह करवा दिया। एहोल प्रशस्ति के अनुसार हर्ष तथा पुलकेशिन द्वितीय के मध्य नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ था। इस युद्ध में हर्ष की पराजय हुई थी। पुलकेशिन द्वितीय दक्षिण भारत के चालुक्य वंश के प्रतापी शासक थे। हर्ष ने कश्मीर पर आक्रमण किया तथा वहाँ से भगवान बुध का दाँत कन्नौज के पास संघाराम में स्थापित किया। इस अभियान के पश्चात् उन्होंने दक्षिण अभियान आरंभ किया। उन्होंने नर्मदा नदी के दक्षिण में सैनिक अभियान पर चोल, कुंतल व कांची पर विजय प्राप्त की। हर्ष के साम्राज्य में मूलतः संपूर्ण उत्तर भारत शामिल था। उनका राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक एवं विंध्य पर्वत तक तथा पूर्व में ब्रह्मपुत्र से पश्चिम में सौराष्ट्र तथा काठियावाड़ तक फैला हुआ था। संभवतः उन्होंने 647 ईसवी तक शासन किया। दुर्भाग्यवश उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं था। इसलिए हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उत्तर भारत में पुनः अराजकता फैल गई एवं कन्नौज पर अर्जुन नाम के किसी स्थानीय शासक ने अधिकार कर लिया।

Unique facts from the life of Harsha- Emperor Harshavardhana defeated Shashanka, the ruler of Gaur (present-day Bengal), in the war and took control of his kingdom Kannauj. Apart from this, he also subjugated the states of other rulers of the northern region of India. They had taken control of Kannauj, Punjab, Gaur, Orissa and Mithila in North India. This is confirmed by Hieun Tsang's travel description. Harsha had also established some friendly relations during his reign. He ended his enmity with 'Dhruvsen II', the ruler of the Vallavi of the west and got his daughter married to him. According to the Aihole Prashasti, there was a war between Harsha and Pulakeshin II on the banks of river Narmada. Harsha was defeated in this war. Pulakeshin II was a majestic ruler of the Chalukya dynasty of South India. Harsha invaded Kashmir and from there installed the tooth of Lord Buddha at Sangharam near Kannauj. After this campaign, he started the South campaign. He conquered the Cholas, Kuntals and Kanchi on a military campaign south of the Narmada river. Harsha's empire originally included the whole of North India. His kingdom extended from the Himalayas in the north to the Narmada River and Vindhya Mountains in the south, and from the Brahmaputra in the east to Saurashtra and Kathiawar in the west. He probably ruled till 647 AD. Unfortunately he had no successor. Therefore, after the death of Harsha, chaos spread again in North India and a local ruler named Arjuna captured Kannauj.

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हर्ष के साम्राज्य की राजव्यवस्था- मूल रूप से सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल, तत्कालीन समाज, राजव्यवस्था, साम्राज्य की सीमा आदि की जानकारी चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा विवरण एवं बाणभट्ट की रचना 'हर्षचरित' से मिलती है। सम्राट हर्षवर्धन ने एक विस्तृत साम्राज्य की स्थापना की थी। इस राज्य की सीमाएँ उत्तर में हिमाच्छादित पर्वतों तक, दक्षिण में नर्मदा नदी तक, पूर्व में गंजाम और पश्चिमी वल्लभी तक फैली हुई थी। उनका साम्राज्य मुख्य रूप से सामंती संगठन पर आधारित था। राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था हेतु उसे ग्राम, विषय, भक्ति और राष्ट्र में विभाजित किया गया था। इस अवधि में भुक्ति से तात्पर्य प्रांत से होता था। यह जिले के समान होता था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम होती थी। ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार हर्ष की सेना 'चतुरंगिणी' थी। उनकी सेना में हाथी की टुकड़ियाँ, रथ, घुड़सवार और पैदल सेनाएँ शामिल थीं। सम्राट की सहायता करने हेतु मंत्रिपरिषद नियुक्त किया जाता था। मंत्री को सचिव अथवा अमात्य कहा जाता था। हर्षवर्धन का प्रधान सचिव भंडि था। उनके विदेश सचिव अवंती थे। इन्हें महासंधिविग्रहक की संज्ञा दी गई थी। उनका प्रधान सेनापति सिंहनाद था। अश्वारोही सेना का सर्वोच्च अधिकारी कुंतल था। इसके अतिरिक्त वह स्कंदगुप्त की गज सेना का प्रधान हुआ करता था। इन सबके अलावा राज्यस्थानीय संभवतः वायसराय अथवा गवर्नर होता था। इस अवधि में न्याय व्यवस्था का सबसे उच्च अधिकारी सम्राट हुआ करता था। इस अवधि की कानून व्यवस्था अच्छी नहीं थी। इसकी पुष्टि ह्वेनसांग के विवरण से होती है। राज्य में अपराध के लिए कठोर दंड दिया जाता था। राज्य को सर्वाधिक आय भूमि से होती थी। 'भोगिक' कर वसूलने वाला एवं 'पुस्तकल' जमीन का हिसाब रखने वाला पदाधिकारी होता था। भूमि की उपज का छठा भाग राजस्व के रूप में लिया जाता था।

Politics of Harsha's Empire- Originally information about the reign of Emperor Harshavardhana, the then society, polity, extent of the empire etc. information is found in travel Details of the Chinese Traveler HiuenTsang and Banabhatta's composition 'Harshacharita'. Emperor Harshavardhana had established a vast empire. The boundaries of this state extended to the snow-capped mountains in the north, river Narmada in the south, Ganjam in the east and Vallabhi in the west. His empire was mainly based on feudal organization. For the administrative system of the state, it was divided into village, subject, bhakti and nation. In this period Bhukti meant province. It was like a district. The smallest unit of government was the village. According to Hiuen Tsang's description, Harsha's army was 'Chaturangini'. His army consisted of detachments of elephants, chariots, cavalry and infantry. A council of ministers was appointed to assist the emperor. The minister was called secretary or amatya. Harsh Vardhan's principal secretary was Bhandi. His foreign secretary was Avanti. He was given the name of Mahasandhivigraha. His chief commander was Singhnad. The highest officer of the cavalry army was Kuntal. Apart from this, he used to be the head of the Gaj army of Skandagupta. Apart from all this, the state local was probably the Viceroy or the Governor. During this period the highest official of the judicial system was the emperor. The law and order situation of this period was not good. This is confirmed by Hieun Tsang's description. Severe punishment was given for the crime in the state. The state received maximum income from land. 'Bhogik' was the tax collector and 'book' was the official who kept the account of the land. One-sixth of the produce of the land was taken as revenue.

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हर्ष के शासनकाल में बौद्ध धर्म- हर्षवर्धन के पूर्वज भगवान शिव तथा सूर्य के अनन्य उपासक थे। प्रारंभ में सम्राट भी अपने कुलदेवता भगवान शिव के परम भक्त थे। किंतु चीनी यात्री ह्वेनसांग से संपर्क स्थापित होने के पश्चात् उन्होंने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजाश्रय प्रदान किया। वे पूर्णतः बौद्ध बन गए। उनके शासनकाल में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रमुख केंद्र बन गया था। हर्ष ने कन्नौज और प्रयाग में दो विशाल धार्मिक सभाओं का आयोजन किया था। भारतवर्ष में कुंभ के मेले की शुरुआत करने का श्रेय सम्राट हर्षवर्धन को ही दिया जाता है।

Buddhism during Harsha's reign- Harshavardhana's ancestors were exclusive worshipers of Lord Shiva and Surya. In the beginning, the emperor was also an ardent devotee of his totem deity Lord Shiva. But after establishing contact with the Chinese traveler Hiuen Tsang, he provided royal shelter to the Mahayana branch of Buddhism. He became a complete Buddhist. During his reign Nalanda Mahavihara became a major center of teaching of Mahayana Buddhism. Harsha had organized two huge religious assemblies at Kannauj and Prayag. Emperor Harshavardhana is credited with starting the Kumbh fair in India.

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साहित्य- इस अवधि में हर्ष के दरबार के प्रमुख विद्वान बाणभट्ट और मयूर थे। बाणभट्ट की प्रमुख रचनाएँ हर्षचरित और कादंबरी थीं। वहीं मयूर की प्रमुख रचना सूर्यशतक थी। हर्षवर्धन स्वयं एक साहित्यकार थे। उन्होंने प्रियदर्शिका, रत्नावली और नागानंद नामक तीन नाटकों की रचना की थी। इन रचनाओं को धावक नाम के एक कवि द्वारा लिखे जाने का भी विवरण मिलता है। इस अवधि में जयसेन नाम का एक विद्वान हुआ करता था। वह स्वयं को कालिदास व भाग के समान बताता था।

Literature- The prominent scholars of Harsha's court during this period were Banabhatta and Mayure. The major works of Banabhatta were Harshacharita and Kadambari. At the same time, the main composition of the peacock was Suryashatak. Harshavardhana himself was a litterateur. He composed three plays named Priyadarsika, Ratnavali and Nagananda. There is also a description of these compositions being written by a poet named Runner. There used to be a scholar named Jayasena during this period. He used to equate himself with Kalidasa and Bhaag.

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अन्य तथ्य- हर्ष के अधीनस्थ शासक महाराज या महासामंत कहलाते थे। राजव्यवस्था की सुविधा हेतु साम्राज्य को कई प्रांतों में विभक्त किया गया था। प्रांत को भुक्ति कहा जाता था। शासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम हुआ करती थी। ग्राम शासन के प्रधान को ग्रामक्षपटलिक कहा जाता था। हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुला यंत्र या जलपंप का विवरण मिलता है। इस अवधि में मथुरा सूती वस्त्रों के निर्माण हेतु भारतवर्ष में प्रसिद्ध था। हर्ष का शासन उत्तर में कश्मीर को छोड़कर सभी प्रांतों में था।

Other Facts- The rulers subordinate to Harsha were called Maharajs or Mahasamantas. For the convenience of polity, the empire was divided into several provinces. The province was called Bhukti. The smallest unit of government was the village. The head of the village government was called Gramakshapatlik. In Harshacharita, the description of Tula Yantra or water pump is found as a means of irrigation. During this period Mathura was famous in India for the manufacture of cotton textiles. Harsha's rule was in all the provinces except Kashmir in the north.

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आशा है, उपरोक्त जानकारी परीक्षार्थियों / विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं परीक्षापयोगी होगी।
धन्यवाद।
RF Temre
infosrf.com



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