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गुप्त शासक श्रीगुप्त, घटोत्कच और चंद्रगुप्त प्रथम | Gupta rulers Shrigupta, Ghatotkach and Chandragupta

  • BY:RF Temre
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श्रीगुप्त- श्रीगुप्त ने भारतवर्ष में गुप्त वंश की स्थापना की थी। इन्होंने अपने शासनकाल में 'महाराज' की उपाधि धारण की थी। इस उपाधि से पता चलता था कि उपाधि से संबंधित शासक किसी अन्य शासक के अधीन शासन नहीं करता था। महाराज सामंतों की उपाधि होती थी। श्रीगुप्त ने मगध में एक मंदिर का निर्माण करवाया और उस मंदिर के खर्च हेतु 24 ग्राम दान में दिए थे। इसकी जानकारी हमें चीनी यात्री 'इत्सिंग' के विवरण से प्राप्त होती हैं।

Shrigupta- Shrigupta established the Gupta dynasty in India. He assumed the title of 'Maharaj' during his reign. This title showed that the ruler belonging to the title did not rule under any other ruler. Maharaj used to have the title of feudal. Shrigupta got a temple built in Magadha and donated 24 grams for the expenses of that temple. We get this information from the description of Chinese traveler 'Itsing'.

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घटोत्कच- श्रीगुप्त की मृत्यु होने के पश्चात उसका पुत्र 'घटोत्कच' गुप्त वंश का अगला शासक बना। गुप्त शासकों का राजनीतिक इतिहास घटोत्कच के समय से ही शुरू हुआ था। स्कंदगुप्त के "सुपिया के लेख (रीवा, मध्य प्रदेश)" में गुप्तों का शासन घटोत्कच के समय से ही शुरू माना गया है।

Ghatotkach- After the death of Shrigupta, his son 'Ghatotkach' became the next ruler of the Gupta dynasty. The political history of the Gupta rulers started from the time of Ghatotkacha. In Skandagupta's "Supia's writings (Rewa, Madhya Pradesh)", the rule of the Guptas is considered to have started from the time of Ghatotkacha.

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चंद्रगुप्त प्रथम- घटोत्कच के पश्चात चंद्रगुप्त प्रथम ने शासन किया। इन्हें गुप्त वंश का सबसे शक्तिशाली राजा माना जाता है। इन्होंने 319 ईस्वी से 350 ईस्वी तक शासन किया। चंद्रगुप्त प्रथम को गुप्त वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। इन्होंने अपने शासनकाल में एक नया संवत् चलाया, जिससे 'गुप्त संवत्' के नाम से जाना जाता है। यह संवत् मुख्य रूप से गुप्त सम्राटों के काल तक ही प्रचलित रहा। गुप्त संवत् तथा शक संवत् के मध्य 241 वर्षों का अंतर है।
गुप्त संवत्- 319 ईस्वी
शक संवत- 78 ईस्वी
चंद्रगुप्त प्रथम के राज्य अभिषेक की तिथि 319 ईस्वी है। इस तिथि को भी गुप्त संवत् का प्रारंभ माना जाता है। चंद्रगुप्त के राज्यारोहण के समय गुप्त शासकों का राज्य केवल मगध तक ही सीमित था। चंद्रगुप्त ने इसे विस्तृत कर इलाहाबाद तक बढ़ा दिया। समुद्रगुप्त ने लिच्छवी राज्य की राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह किया था। इस वजह से उसे लिच्छवियों की सहायता प्राप्त हुई और उसने अपनी शक्ति में वृद्धि कर ली। इस विवाह के प्रमुख रूप से दो प्रमाण हैं। चंद्रगुप्त के सोने के सिक्कों में 'लिच्छवी प्रकार', 'चंद्रगुप्त कुमार देवी प्रकार', 'विवाह प्रकार', 'राजा-रानी प्रकार' आदि लिखा प्राप्त हुआ है। इसके अतिरिक्त प्रयाग प्रशस्ति अभिलेख में समुद्रगुप्त (चंद्रगुप्त प्रथम का पुत्र) को 'लिच्छवी दौहित्र' कह कर संबोधित किया गया है। लिच्छवी राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह करने पर चंद्रगुप्त प्रथम को वैशाली राज्य प्राप्त हुआ। चंद्रगुप्त ने अपने सिक्कों के पृष्ठ भाग पर 'लिच्छवयः (लिच्छवी)' लिखवाया था। उसने अपने सिक्कों पर स्वयं के साथ कुमार देवी का नाम भी खुदवाया। चंद्रगुप्त को भारतीय इतिहास में एक नए संवत् के प्रवर्तन का श्रेय मिलता है। 'फ्लीट' की गणना के अनुसार इस संवत् का प्रचलन 319-20 ईस्वी तक किया गया था। गुप्त काल में सर्वप्रथम चंद्रगुप्त प्रथम ने चांदी के सिक्के चलवाए। अपने शासनकाल के पश्चात चंद्रगुप्त प्रथम ने समुद्रगुप्त को संपूर्ण साम्राज्य सौंप दिया और स्वयं सन्यास ग्रहण कर लिया।

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Chandragupta I- After Ghatotkacha, Chandragupta I ruled. He is considered the most powerful king of the Gupta dynasty. He ruled from 319 AD to 350 AD. Chandragupta I is said to be the real founder of the Gupta dynasty. He started a new era during his reign, which is known as 'Gupta era'. This era was mainly prevalent till the time of the Gupta emperors. There is a gap of 241 years between the Gupta era and the Shak era.
Gupta era- 319 AD
Saka era- 78 AD
The date of coronation of Chandragupta I is 319 AD. This date is also considered to be the beginning of the Gupta era. At the time of Chandragupta's accession, the kingdom of the Gupta rulers was limited to Magadha only. Chandragupta expanded it to Allahabad. Samudragupta married Kumar Devi, a princess of the Lichchavi kingdom. Because of this he got the help of the Lichchhavis and increased his power. There are mainly two proofs of this marriage. In Chandragupta's gold coins, 'Licchavi type', 'Chandragupta Kumar Devi type', 'Marriage type', 'King-Queen type' etc. have been found. Apart from this, in Prayag Prashasti inscription Samudragupta (son of Chandragupta I) is addressed as 'Licchavi Dauhitra (grand son)'. Chandragupta I got the kingdom of Vaishali after marrying the Lichchavi princess Kumar Devi. Chandragupta had written 'Licchavayah (Licchavi)' on the reverse side of his coins. He also got the name of Kumar Devi engraved on his coins along with himself. Chandragupta gets the credit for the initiation of a new era in Indian history. According to the calculation of 'Fleet', this era was prevalent till 319-20 AD. During the Gupta period, Chandragupta I first introduced silver coins. After his reign, Chandragupta I handed over the entire empire to Samudragupta and himself took retirement.

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आशा है, अध्ययन की दृष्टि से परीक्षार्थियों के लिए यह लेख महत्वपूर्ण और उपयोगी होगा।
धन्यवाद।
RF Temre
infosrf.com



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